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॥ श्रीः ॥
8.12. अध्यायः 012
Mahabharata - Karna Parva - Chapter Topics
भीमाश्वत्थाम्नोर्युद्धम्॥ 1 ॥

Mahabharata - Karna Parva - Chapter Text
सञ्जय उवाच। 8-12-0x(4860)(55482)
भीमसेनं ततो द्रौणी राजन्विव्याध पत्रिणा।
परया त्वरया युक्तो दर्शयन्नस्त्रलाघवम्॥ 8-12-1(55483)
अथैनं पुनराजघ्ने नवत्या निशितैः शरैः।
सर्वमर्माणि सम्प्रेक्ष्य मर्मज्ञो लघुहस्तवत्॥ 8-12-2(55484)
भीमसेनः समाकीर्णो द्रौणिना निशितैः शरैः।
रराज समरे राजन्रश्मिवानिव भास्करः॥ 8-12-3(55485)
ततः शरसहस्रेण सुप्रयुक्तेन पाण्डवः।
द्रोणपुत्रमवच्छाद्य सिंहनादममुञ्चत॥ 8-12-4(55486)
शरैः सरांस्ततो द्रौणिः संवार्य युधि पाण्डवम्।
ललाटेऽभ्याहनद्राजन्नाराचेन स्मयन्निव॥ 8-12-5(55487)
ललाटस्थं ततो बाणं धारयामास पाण्डवः।
यथा शृङ्गं वने दृप्तः खङ्गो धारयते नृप॥ 8-12-6(55488)
ततो द्रौणिं रणे भीमो यतमानं पराक्रमी।
त्रिभिर्विव्याध नाराचैर्ललाटे विस्मयन्निव॥ 8-12-7(55489)
ललाटस्थैस्ततो बाणैर्ब्राह्मणोऽसौ व्यशोभत।
प्रावृषीव यथा सिक्तस्त्रिशृङ्गः पर्वतोत्तमः॥ 8-12-8(55490)
ततः शरशतैर्द्रौणिरर्दयामास पाण्डवम्।
न चैनं कम्पयामास मातरिश्वेव पर्वतम्॥ 8-12-9(55491)
तथैव पांण्डवो युद्धे द्रौणिं शरशतैः शितैः।
नाकम्पयत संहृष्टो वार्योध इव पर्वतम्॥ 8-12-10(55492)
तावन्योन्यं शरैर्घोरैश्छादयानौ महारथौ।
रथवर्यगतौ वीरौ शुशुभाते बलोत्कटौ॥ 8-12-11(55493)
आदित्याविव सन्दीप्तौ लोकक्षयकरावुभौ।
स्वरश्मिभिरिवान्योन्यं तापयन्तौ शरोत्तमैः॥ 8-12-12(55494)
ततः प्रविकृते यत्नं कुर्वाणौ तौ महारणे।
कृतप्रतिकृते यत्तौ शरसङ्घैरभीतवत्॥ 8-12-13(55495)
व्याघ्राविव च सङ्ग्रामे चेरतुस्तौ नरोत्तमौ।
शरदंष्ट्रौ दुराधर्षौ चापवक्रौ भयङ्करौ॥ 8-12-14(55496)
अभूतां तावदृश्यौ च शरजालैः समन्ततः।
मेघजालैरिव च्छनौ गगने चन्द्रभास्करौ॥ 8-12-15(55497)
चकाशेते मुहूर्तेन ततस्तावप्यरिन्दमौ।
विमुक्तावभ्रजालेन अङ्गारकबुधाविव॥ 8-12-16(55498)
अथ तत्रैव सङ्ग्रमे वर्तमाने सुदारुणे।
अपसव्यं ततश्चक्रे द्रौणिस्तत्र वृकोदरम्॥ 8-12-17(55499)
किरञ्छरशतैरुग्रैर्धाराभिरिव पर्वतम्।
न तु तन्ममृषे भीमः शत्रोर्विजलक्षणम्॥ 8-12-18(55500)
प्रतिचक्रे ततो राजन्पाण्डवोऽप्यपसव्यतः।
मण्डलानां विभागेन गतप्रत्यागतेन च॥ 8-12-19(55501)
बभूव तुमुलं युद्धं तयोः पुरुषसिंहयोः।
चरित्वा विविधान्मार्गान्मण्डलस्थानमेव च॥ 8-12-20(55502)
शरैः पूर्णायतोत्सृष्टैरन्योन्यमभिजघ्नतुः।
अन्योन्यस्य वधे चैव चक्रतुर्यत्नमुत्तमम्॥ 8-12-21(55503)
ईषतुर्विरथं चैव कर्तुमन्योन्यमाहवे।
ततो द्रौणिर्महास्त्राणि प्रादुश्चक्रे महारथः॥ 8-12-22(55504)
तान्यस्त्रैरेव समरे प्रतिजघ्नेऽथ पाण्डवः।
ततो घोरं महाराज अस्त्रयुद्धमवर्तत॥ 8-12-23(55505)
ग्रहयुद्वं यथा घोरं प्रजासंहरणे ह्यभूत्।
ते वाणाः समसज्जन्त मुक्तास्ताभ्यां तु भारत॥ 8-12-24(55506)
द्योतग्रन्तो दिशः सर्वास्तव सैन्यं समन्ततः।
बाणसङ्घैर्वृतं घोरमाकाशं समपद्यत॥ 8-12-25(55507)
उल्कापातावृतं युद्धं प्रजानां संक्षये नृप।
बाणाभिघातात्सञ्जज्ञे तत्र भारत पावकः॥ 8-12-26(55508)
सविस्फुलिङ्गो दीप्तार्चिर्योऽदहद्वाहिनीद्वयम्।
तत्र सिद्धा महाराज सम्पतन्तोऽब्रुवन्वचः॥ 8-12-27(55509)
युद्धानामति सर्वेषां युद्धमेतदिति प्रभो।
सर्वयुद्धानि चैतस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ 8-12-28(55510)
नेदृशं च पुनर्युद्धं भविष्यति कदाचन।
अहो ज्ञानेन सम्पन्नावुभ ब्राह्मणक्षत्रियौ॥ 8-12-29(55511)
अहो शौर्येण सम्पन्नावुभौ चोग्रपराक्रमौ।
अहो भीमबलो भीम एतस्य च कृतास्त्रता॥ 8-12-30(55512)
अहो वीर्यस्य सारत्वमहो सौष्ठवमेतयोः।
स्थितावेतौ हि समरे कालान्तकयमोपमौ॥ 8-12-31(55513)
रुद्रौ द्वावि सम्भूतौ यथा द्वाविव भास्करौ।
यमौ वा पुरुषव्याघ्रौ घोररूपावुभौ रणे॥ 8-12-32(55514)
इति वाचः स्म श्रूयन्ते सिद्धानां वै मुहुर्मुहुः।
सिंहनादश्च सञ्जज्ञे समेतानां दिवौकसाम्॥ 8-12-33(55515)
अद्भुतं चाप्यचिन्त्यं च दृष्ट्वा कर्म तयो रणे।
सिद्वचारणसङ्घानां विस्मयः समपद्यत॥ 8-12-34(55516)
प्रशंसन्ति तदा देवाः सिद्वाश्च परमर्षयः।
साधु द्रौणे महाबाहो साधु भीमेति चाब्रुवन्॥ 8-12-35(55517)
तौ शूरौ समरे राजन्परस्परकृतागसौ।
परस्परमुदीक्षेतां क्रोधादुद्वृत्य चक्षुषी॥ 8-12-36(55518)
क्रोधरक्तेक्षणौ तौ तु क्रोधात्प्रस्फुरिताधरौ।
क्रोधात्संदष्टदशनौ तथैव दशनच्छदौ॥ 8-12-37(55519)
अन्योन्यं छादयन्तौ स्म शरवृष्ट्या महारथौ।
शराम्बुधारो समरे शस्त्रविद्युत्प्रकाशिनौ॥ 8-12-38(55520)
तावन्यन्यं ध्वजं विद्व्वा सारथिं च महारणे।
अन्योन्यस्य हयान्विद्वा बिभिदाते परस्परम्॥ 8-12-39(55521)
ततः क्रुद्धौ महाराज बाणौ गृह्य महाहवे।
उभौ चिक्षिपतुस्तूर्ममन्योन्यस्य वधैषिणौ॥ 8-12-40(55522)
तौ सायकौ महाराज द्योतमानौ चमूमुखे।
आजघ्नतुः समासाद्य वज्रवेगौ दुरासदौ॥ 8-12-41(55523)
तौ परस्परवेगाच्च शराभ्यां च भृशाहतौ।
निपेततुर्महावीर्यौ रथोपस्थे तयोस्तदा॥ 8-12-42(55524)
ततस्तु सारथिर्ज्ञात्वा द्रोणपुत्रमचेतनम्।
अपोवाह रणाद्राजन्सर्वसैन्यस्य पश्यतः॥ 8-12-43(55525)
8-12-44(55526)
तथैव पाण्डवं राजन्विह्वलन्तं मुहुर्मुहुः।
अपोवाह रथेनाजौ विशोकः शत्रुतापनम्॥ ॥ *इति श्रीमन्महाभारते कर्णपर्वणि षोडशदिवसयुद्धे द्वादशोऽध्यायः॥ 12 ॥ *.झ. पन्तके एतदनन्तरं स्थिताः सप्ताध्याया एतत्पाठे क्रमेण 52-53-54-55-56-59-60 तमाध्यायतया वर्तन्ते।
Mahabharata - Karna Parva - Chapter Footnotes
8-12-6 खङ्गः पण्डकः॥ 8-12-13 कृतप्रतिकृते अन्योन्यास्नप्रतिघाते॥ 8-12-22 ईषतुः इच्छां चक्रतुः॥ 8-12-26 उत्कानामन्योन्या भिमुखं पातास्तैरावृतमिवेति लुप्तोपमा॥ 8-12-37 तथैव दशनच्छदौ क्रोधात्सन्दष्टोष्टौ॥ 8-12-12 द्वादशोऽध्यायः॥


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