(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

Mahabharata - कर्णपर्व


॥ श्रीः ॥
8.12. अध्यायः 012
Mahabharata - Karna Parva - Chapter Topics
भीमाश्वत्थाम्नोर्युद्धम्॥ 1 ॥


Mahabharata - Karna Parva - Chapter Text

सञ्जय उवाच। 8-12-0x(4860)(55482)
भीमसेनं ततो द्रौणी राजन्विव्याध पत्रिणा।
परया त्वरया युक्तो दर्शयन्नस्त्रलाघवम्॥ 8-12-1(55483)
अथैनं पुनराजघ्ने नवत्या निशितैः शरैः।
सर्वमर्माणि सम्प्रेक्ष्य मर्मज्ञो लघुहस्तवत्॥ 8-12-2(55484)
भीमसेनः समाकीर्णो द्रौणिना निशितैः शरैः।
रराज समरे राजन्रश्मिवानिव भास्करः॥ 8-12-3(55485)
ततः शरसहस्रेण सुप्रयुक्तेन पाण्डवः।
द्रोणपुत्रमवच्छाद्य सिंहनादममुञ्चत॥ 8-12-4(55486)
शरैः सरांस्ततो द्रौणिः संवार्य युधि पाण्डवम्।
ललाटेऽभ्याहनद्राजन्नाराचेन स्मयन्निव॥ 8-12-5(55487)
ललाटस्थं ततो बाणं धारयामास पाण्डवः।
यथा शृङ्गं वने दृप्तः खङ्गो धारयते नृप॥ 8-12-6(55488)
ततो द्रौणिं रणे भीमो यतमानं पराक्रमी।
त्रिभिर्विव्याध नाराचैर्ललाटे विस्मयन्निव॥ 8-12-7(55489)
ललाटस्थैस्ततो बाणैर्ब्राह्मणोऽसौ व्यशोभत।
प्रावृषीव यथा सिक्तस्त्रिशृङ्गः पर्वतोत्तमः॥ 8-12-8(55490)
ततः शरशतैर्द्रौणिरर्दयामास पाण्डवम्।
न चैनं कम्पयामास मातरिश्वेव पर्वतम्॥ 8-12-9(55491)
तथैव पांण्डवो युद्धे द्रौणिं शरशतैः शितैः।
नाकम्पयत संहृष्टो वार्योध इव पर्वतम्॥ 8-12-10(55492)
तावन्योन्यं शरैर्घोरैश्छादयानौ महारथौ।
रथवर्यगतौ वीरौ शुशुभाते बलोत्कटौ॥ 8-12-11(55493)
आदित्याविव सन्दीप्तौ लोकक्षयकरावुभौ।
स्वरश्मिभिरिवान्योन्यं तापयन्तौ शरोत्तमैः॥ 8-12-12(55494)
ततः प्रविकृते यत्नं कुर्वाणौ तौ महारणे।
कृतप्रतिकृते यत्तौ शरसङ्घैरभीतवत्॥ 8-12-13(55495)
व्याघ्राविव च सङ्ग्रामे चेरतुस्तौ नरोत्तमौ।
शरदंष्ट्रौ दुराधर्षौ चापवक्रौ भयङ्करौ॥ 8-12-14(55496)
अभूतां तावदृश्यौ च शरजालैः समन्ततः।
मेघजालैरिव च्छनौ गगने चन्द्रभास्करौ॥ 8-12-15(55497)
चकाशेते मुहूर्तेन ततस्तावप्यरिन्दमौ।
विमुक्तावभ्रजालेन अङ्गारकबुधाविव॥ 8-12-16(55498)
अथ तत्रैव सङ्ग्रमे वर्तमाने सुदारुणे।
अपसव्यं ततश्चक्रे द्रौणिस्तत्र वृकोदरम्॥ 8-12-17(55499)
किरञ्छरशतैरुग्रैर्धाराभिरिव पर्वतम्।
न तु तन्ममृषे भीमः शत्रोर्विजलक्षणम्॥ 8-12-18(55500)
प्रतिचक्रे ततो राजन्पाण्डवोऽप्यपसव्यतः।
मण्डलानां विभागेन गतप्रत्यागतेन च॥ 8-12-19(55501)
बभूव तुमुलं युद्धं तयोः पुरुषसिंहयोः।
चरित्वा विविधान्मार्गान्मण्डलस्थानमेव च॥ 8-12-20(55502)
शरैः पूर्णायतोत्सृष्टैरन्योन्यमभिजघ्नतुः।
अन्योन्यस्य वधे चैव चक्रतुर्यत्नमुत्तमम्॥ 8-12-21(55503)
ईषतुर्विरथं चैव कर्तुमन्योन्यमाहवे।
ततो द्रौणिर्महास्त्राणि प्रादुश्चक्रे महारथः॥ 8-12-22(55504)
तान्यस्त्रैरेव समरे प्रतिजघ्नेऽथ पाण्डवः।
ततो घोरं महाराज अस्त्रयुद्धमवर्तत॥ 8-12-23(55505)
ग्रहयुद्वं यथा घोरं प्रजासंहरणे ह्यभूत्।
ते वाणाः समसज्जन्त मुक्तास्ताभ्यां तु भारत॥ 8-12-24(55506)
द्योतग्रन्तो दिशः सर्वास्तव सैन्यं समन्ततः।
बाणसङ्घैर्वृतं घोरमाकाशं समपद्यत॥ 8-12-25(55507)
उल्कापातावृतं युद्धं प्रजानां संक्षये नृप।
बाणाभिघातात्सञ्जज्ञे तत्र भारत पावकः॥ 8-12-26(55508)
सविस्फुलिङ्गो दीप्तार्चिर्योऽदहद्वाहिनीद्वयम्।
तत्र सिद्धा महाराज सम्पतन्तोऽब्रुवन्वचः॥ 8-12-27(55509)
युद्धानामति सर्वेषां युद्धमेतदिति प्रभो।
सर्वयुद्धानि चैतस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥ 8-12-28(55510)
नेदृशं च पुनर्युद्धं भविष्यति कदाचन।
अहो ज्ञानेन सम्पन्नावुभ ब्राह्मणक्षत्रियौ॥ 8-12-29(55511)
अहो शौर्येण सम्पन्नावुभौ चोग्रपराक्रमौ।
अहो भीमबलो भीम एतस्य च कृतास्त्रता॥ 8-12-30(55512)
अहो वीर्यस्य सारत्वमहो सौष्ठवमेतयोः।
स्थितावेतौ हि समरे कालान्तकयमोपमौ॥ 8-12-31(55513)
रुद्रौ द्वावि सम्भूतौ यथा द्वाविव भास्करौ।
यमौ वा पुरुषव्याघ्रौ घोररूपावुभौ रणे॥ 8-12-32(55514)
इति वाचः स्म श्रूयन्ते सिद्धानां वै मुहुर्मुहुः।
सिंहनादश्च सञ्जज्ञे समेतानां दिवौकसाम्॥ 8-12-33(55515)
अद्भुतं चाप्यचिन्त्यं च दृष्ट्वा कर्म तयो रणे।
सिद्वचारणसङ्घानां विस्मयः समपद्यत॥ 8-12-34(55516)
प्रशंसन्ति तदा देवाः सिद्वाश्च परमर्षयः।
साधु द्रौणे महाबाहो साधु भीमेति चाब्रुवन्॥ 8-12-35(55517)
तौ शूरौ समरे राजन्परस्परकृतागसौ।
परस्परमुदीक्षेतां क्रोधादुद्वृत्य चक्षुषी॥ 8-12-36(55518)
क्रोधरक्तेक्षणौ तौ तु क्रोधात्प्रस्फुरिताधरौ।
क्रोधात्संदष्टदशनौ तथैव दशनच्छदौ॥ 8-12-37(55519)
अन्योन्यं छादयन्तौ स्म शरवृष्ट्या महारथौ।
शराम्बुधारो समरे शस्त्रविद्युत्प्रकाशिनौ॥ 8-12-38(55520)
तावन्यन्यं ध्वजं विद्व्वा सारथिं च महारणे।
अन्योन्यस्य हयान्विद्वा बिभिदाते परस्परम्॥ 8-12-39(55521)
ततः क्रुद्धौ महाराज बाणौ गृह्य महाहवे।
उभौ चिक्षिपतुस्तूर्ममन्योन्यस्य वधैषिणौ॥ 8-12-40(55522)
तौ सायकौ महाराज द्योतमानौ चमूमुखे।
आजघ्नतुः समासाद्य वज्रवेगौ दुरासदौ॥ 8-12-41(55523)
तौ परस्परवेगाच्च शराभ्यां च भृशाहतौ।
निपेततुर्महावीर्यौ रथोपस्थे तयोस्तदा॥ 8-12-42(55524)
ततस्तु सारथिर्ज्ञात्वा द्रोणपुत्रमचेतनम्।
अपोवाह रणाद्राजन्सर्वसैन्यस्य पश्यतः॥ 8-12-43(55525)
8-12-44(55526)
तथैव पाण्डवं राजन्विह्वलन्तं मुहुर्मुहुः।
अपोवाह रथेनाजौ विशोकः शत्रुतापनम्॥ ॥ *इति श्रीमन्महाभारते कर्णपर्वणि षोडशदिवसयुद्धे द्वादशोऽध्यायः॥ 12 ॥ *.झ. पन्तके एतदनन्तरं स्थिताः सप्ताध्याया एतत्पाठे क्रमेण 52-53-54-55-56-59-60 तमाध्यायतया वर्तन्ते।
Mahabharata - Karna Parva - Chapter Footnotes
8-12-6 खङ्गः पण्डकः॥ 8-12-13 कृतप्रतिकृते अन्योन्यास्नप्रतिघाते॥ 8-12-22 ईषतुः इच्छां चक्रतुः॥ 8-12-26 उत्कानामन्योन्या भिमुखं पातास्तैरावृतमिवेति लुप्तोपमा॥ 8-12-37 तथैव दशनच्छदौ क्रोधात्सन्दष्टोष्टौ॥ 8-12-12 द्वादशोऽध्यायः॥


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